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नवजात की असमय विदाई, लेकिन मानवता की अमर मिसाल बनी

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नवजात की असमय मृत्यु के बाद दंपती ने किया देहदान, मानवता की मिसाल पेश की

ऋषिकेश (आरएनएस)। एम्स ऋषिकेश में उपचार के दौरान एक नवजात की असमय मृत्यु के बाद उसके माता-पिता ने गहरे शोक के बीच मानवता का परिचय देते हुए नवजात का देहदान कर चिकित्सा शोध में योगदान दिया। इस संवेदनशील निर्णय की क्षेत्र में व्यापक सराहना की जा रही है।

नेत्रदान कार्यकर्ता और लायंस क्लब ऋषिकेश देवभूमि के चार्टर अध्यक्ष गोपाल नारंग ने बताया कि चमोली निवासी संदीप राम की पत्नी हंसी ने दो जनवरी को श्रीनगर में एक नवजात शिशु को जन्म दिया था। जन्म के बाद शिशु में जन्मजात महावृहदान्त्र, जिसे हिर्शस्प्रुंग रोग कहा जाता है, की पुष्टि हुई। इस रोग में आंतों में तंत्रिका गुच्छों का अभाव होता है और यह अपेक्षाकृत दुर्लभ माना जाता है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए नवजात को श्रीनगर से एम्स ऋषिकेश रेफर किया गया।

एम्स ऋषिकेश में शिशु का ऑपरेशन किया गया और प्रारंभिक रूप से उसकी जान बचाई गई, लेकिन ऑपरेशन के तीन दिन बाद रिफ्रैक्टरी सेप्टिक शॉक के कारण नवजात की मृत्यु हो गई। इस दुखद स्थिति में अंतिम संस्कार की प्रक्रिया को लेकर स्वजन एम्स ऋषिकेश के सीनियर नर्सिंग ऑफिसर मोहित और महिपाल से संपर्क में आए। उनकी पहल पर मोहन फाउंडेशन उत्तराखंड के प्रोजेक्ट लीडर संचित अरोड़ा को सूचना दी गई।

गोपाल नारंग के अनुसार संचित अरोड़ा ने शोकाकुल दंपती को देहदान के महत्व के बारे में जानकारी दी और बताया कि इससे चिकित्सा शोध और मानव कल्याण के कई कार्यों में सहायता मिल सकती है। विचार-विमर्श के बाद दंपती ने मृत नवजात के देहदान की सहमति दी।

इसके बाद एम्स ऋषिकेश के एनाटॉमी विभाग के अध्यक्ष मुकेश सिंगला और प्रोफेसर रश्मि मल्होत्रा से संपर्क किया गया। उनके निर्देशन में तकनीकी सहायक अजय रावत ने आवश्यक कागजी कार्यवाही पूरी कर नवजात की देह विभाग को सौंपने की प्रक्रिया संपन्न कराई। इस अवसर पर राजू बोकन, अजय रावत, ऋषभ पंचाल, विजय जुनेजा, अरुण शर्मा, सुरेश, स्नेह कुमारी, रूपेंद्र और नेहा सकलानी ने नवजात की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की और दंपती के इस मानवीय निर्णय की सराहना की।